"जब मेरी तीन साल की बिटिया रोते हुए स्कूल गई – एक माँ के दिल की कहानी"
हर माँ की सुबह एक जैसी नहीं होती। लेकिन मेरी सुबह का हर लम्हा एक नन्हे से चेहरे की हँसी और मासूमियत से शुरू होता है — मेरी प्यारी बेटी 'अधिशा' से। अधिशा अभी तीन साल की भी नहीं हुई, लेकिन उसके बिना मेरा कोई भी दिन अधूरा सा लगता है।
हर सुबह मैं 7:30 बजे उठती हूँ — सबसे पहले दूध गर्म करती हूँ और एक ओर अंडा उबालने रख देती हूँ। फिर धीरे-धीरे अपने दिन की शुरुआत करती हूँ, लेकिन असल सुबह तब होती है जब मैं अपनी बेटी को उठाती हूँ।
मेरी सुबह की सबसे प्यारी जिम्मेदारी – अधिशा को उठाना
करीब 8 बजे मैं अधिशा को बड़े प्यार से उठाती हूँ। उसकी नींद गहरी होती है। आवाज़ देने से उठती नहीं, लेकिन जैसे ही मैं पंखा बंद करती हूँ — वो धीरे से आँखें खोलती है। वो पल… जब उसकी नींद से भरी मासूम आंखें मुझसे टकराती हैं… मेरे लिए दिन की सबसे खूबसूरत शुरुआत होती है।
मैं उसे गर्म दूध देती हूँ जो वो अपने नन्हे-नन्हे हाथों से धीरे-धीरे पीती है। इतने में मैं उसका टिफ़िन तैयार करती हूँ और नहाने के लिए पानी गर्म कर लेती हूँ। दूध पीने के बाद मैं उसे नहलाती हूँ और प्यार से तैयार करती हूँ।
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स्कूल के लिए अधिशा की खुशी
जब उसे पता होता है कि आज स्कूल जाना है, तो वो कोई परेशानी नहीं करती। कपड़े पहनना, बाल बनवाना — सब कुछ खुशी से करती है। हां, यही अधिशा जब घर पर होती है, तो फिर एकदम अलग मस्तीखोर बन जाती है! न कपड़े पहनने देती है, न बाल बनने देती है — बस भागती है, कूदती है और खेलती है… जैसे पूरे घर में उसकी अपनी एक दुनिया हो।
लेकिन स्कूल के दिन वो एक जिम्मेदार सी बच्ची बन जाती है — जो खुद समझती है कि उसे तैयार होना है।
तैयार होने के बाद मैं उसे अंडा और पानी देती हूँ। करीब 8:50 बजे हम दोनों निकलते हैं — मेरी स्कूटी पर बैठकर, जो 5 मिनट का रास्ता है, लेकिन उन 5 मिनटों में हम दोनों की छोटी-सी दुनिया होती है।
स्कूल पहुंचने पर उसका चेहरा
स्कूल पहुंचने पर वो पहले तो बड़ी excited रहती है। Gate के अंदर जाती है क्योंकि मैं साथ होती हूँ। मैं उसे सीधे मैडम के पास छोड़ती हूँ। और फिर…
जैसे ही मैं उसे "Bye" कहती हूँ — उसका चेहरा बदलने लगता है।
वो छोटा सा मासूम चेहरा पहले मुस्कराता है… फिर धीरे-धीरे उदास होता है… और फिर उसकी आँखों से आंसू बहने लगते हैं। वो रोते हुए "Bye Mumma…" कहती है — और उस पल में मेरा दिल जैसे रुक जाता है।
माँ का मन और मजबूरी
मैडम कहती हैं — "आप जाइए, आपको देखकर वो और ज्यादा रोएगी।"
मैं बाहर तो आ जाती हूँ… लेकिन कदम स्कूल गेट से ज्यादा दूर नहीं जाते। मैं वहीं खड़ी रह जाती हूँ — उस गेट के पास… जहां मेरी बच्ची अंदर रो रही होती है।
मुझे लगता है कि काश मैं उसे एक बार और गले से लगा सकूं… उसे यकीन दिला सकूं कि मैं कहीं नहीं जा रही… बस कुछ घंटों के लिए दूर हूं।
वो सिर्फ एक बच्ची है…
आख़िरकार वो सिर्फ 3 साल की बच्ची है। जिसे ममता चाहिए, साथ चाहिए, और सबसे ज्यादा — “माँ” चाहिए।
Adhisha पढ़ाई में होशियार है, खेल-कूद में भी बहुत अच्छी है। लेकिन उसके लिए सबसे जरूरी मैं हूं… उसकी मम्मा।
दोपहर 12 बजे – हमारी फिर से मुलाकात
जब 12 बजे स्कूल की छुट्टी होती है, मैं उसे लेने पहुंचती हूँ। और जैसे ही वो मुझे देखती है — उसकी आँखें फिर से भर जाती हैं। वो दौड़ती हुई मेरे पास आती है… और मैं उसे सीने से लगा लेती हूँ — ज़ोर से, मजबूती से।
2 मिनट तक मैं उसे बस यूं ही पकड़ के रखती हूँ… ताकि उसे लगे कि वो अब पूरी तरह सुरक्षित है।
फिर वो धीरे-धीरे नार्मल होती है। मैडम को मुस्कराकर "Bye" कहती है… और फिर हम घर लौट आते हैं — जैसे कोई लंबी लड़ाई के बाद दो साथी फिर से मिल गए हों।
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मां होना आसान नहीं होता...
हर दिन मेरी बच्ची मुझे थोड़ा-थोड़ा छोड़ रही है… थोड़ा-थोड़ा बड़ा हो रही है।
लेकिन हर दिन मैं खुद को थोड़ा-थोड़ा संभालना भी सीख रही हूँ।
कभी खुशी से, कभी आँसुओं से… लेकिन माँ होने का ये सफर सबसे सुंदर है।
आज जब मैं उसे रोते हुए स्कूल छोड़ती हूँ — तो लगता है जैसे दिल का एक टुकड़ा वहीं छोड़ आई हूँ।
लेकिन फिर यही सोचती हूँ — उसे मजबूत बनाना है, उसे दुनिया की सीख देनी है… और ये सब ममता के साथ करना है।
जब आपके बच्चे रोते है तो आपको कैसा महसूस होता हैं कमेंट्स कर के बताए

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